पंचतंत्री वीणा के स्वर गूंजे
जयपुर। राजस्थान यूनिवर्सिटी के संगीत-विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगीत सेमिनार के दूसरे दिन कला-मर्मज्ञ प्रो. भवानी शंकर शर्मा ने ललित कलाओं की समसामयिक सृजनात्मकता एवं इसके वैश्विक प्रभाव को विस्तार से बताया। सेमिनार की शुरूआत में विख्यात पंचतंत्री वीणा वादक पं. टी. रविशंकर भट्ट तैलंग का वादन हुआ। पं. रविशंकर ने राग नट भैरव को मनोयोग से प्रस्तुत करते हुए इसमें गायकी व तंत्रकारी अंग का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत किया। तैलंग ने अपने वादन में धु्रवपद अंग की मींड व गमक एवं तंत्रकारी अंग का जोड़-झाला, आलाप एवं तिहाइयों को तैयारी के साथ प्रस्तुत किया। पं. टी. रविशंकर भट्ट तैलंग ने वादन के साथ गायन में भी अपने पाण्डित्य को प्रस्तुत किया। तबला-संगत में जयपुर के तबला वादक पं. महेंद्र शंकर डांगी ने रोचक एवं सधी हुई संगत से प्रस्तुति में नए रंग भरे। सेमिनार के दोनों दिनों में देश-विदेश से आए करीब 150 से अधिक संगीत-व्याख्याताओं व शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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